• Akash Jha

कालिदास-संस्कृत के उन्मुक्त कवि


संस्कृत सहित्य के महान कवि तथा नाट्यकार कालिदास के काव्यजगत उत्कर्ष की समीक्षा को छोड़कर उनके विषय मे सब कुछ विवादास्प्द है| महाकवि के जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं है| यहां तक कि उनके समय काल और उनके जन्म स्थान के बारे में भी इतिहास से हमें कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिलती और न ही कालिदास ने अपनी रचनाओं में अपने समय काल का कोई जिक्र किया है। उनके जीवन के इन सभी पहलुओं का अंदाजा उनकी कविताओं के माध्यम से ही लगाया गया है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने अपनी कविता में जिस स्थान के प्रति प्रेम व्यक्त किया है, उस स्थान को उनके जन्म स्थान से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा जिस राजा का उल्लेख उन्होंने अपनी कविताओं और नाटकों में किया है उस राजा के समय काल से कालिदास का संबंध जोड़ा जाता है| उन्होंने अपने खंडकाव्य मेघदूत में मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर का वर्णन किया है, इसलिए कई इतिहासकार मानते है महाकवि कालिदास उज्जैन के निवासी थे। कुछ विद्वान इन्हें काली के वर्णन के आधार पर बंगाल का मूल निवासी मानते हैं। कुछ साहित्यकारों की माने तो कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कविल्ठा गांव में भारत सरकार ने कालिदास की एक प्रतिमा स्थापित की है, इसके साथ ही एक सभागार का निर्माण भी करवाया है| इसके साथ ही आपको ये भी बता दें कि इस ऑडिटोरियम में हर साल जून में तीन दिनों की एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन होता है, जिसमें हिस्सा लेने देश के अलग-अलग हिस्सों से विद्वान आते हैं। कालिदास केवल भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेश में भी संस्कृत साहित्य में एक चमकते हुए प्रदीप्ति जुगनु के तरह सर्वव्यापी है| कालिदास ने अपनी दूरदर्शी सोच और विलक्षण बुद्धि से जो रचनाएं लिखी हैं उनकी बदौलत उनकी गणना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कवियों और नाटककारों में होती है। उनकी रचनाओं का साहित्य के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। उनके रचनाओं की लंबी लिस्ट है लेकिन कालिदास को उनकी इन रचनाओं की वजह से सबसे ज्यादा ख्याति मिली है| वे रचनाएं इस प्रकार हैं – चार काव्य-ग्रंथ प्रसिद्ध है- रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत और ऋतुसंहार| तीन नाटक प्रसिद्ध हैं- अभिज्ञान शाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्र और विक्रमोर्वशीय। रघुवंश (महाकाव्य) – रघुवंश’ की कथा को कालिदास ने १९ (उन्नीस) सर्गों में बाँटा है जिनमें राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि तथा बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथा गूँथी गई है। कुमारसंभवम् (महाकाव्य) – महाकाव्य कुमारसंभवम् में भगवान शिव और माता पार्वती जी की प्रेमकथा की व्याख्या की है! इसके अलावा इस महाकाव्य में भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के जन्म के बारे में भी व्याख्या की गई है। रघुवंश (महाकाव्य) – रघुवंश’ की कथा को कालिदास ने १९ सर्गों में बाँटा है जिनमें राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि तथा बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथा गूँथी गई है। कुमारसंभवम् (महाकाव्य) – महाकाव्य कुमारसंभवम् में भगवान शिव और माता पार्वती जी की प्रेमकथा की व्याख्या की है! इसके अलावा इस महाकाव्य में भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के जन्म के बारे में भी व्याख्या की गई है। मालविकाग्रिमित्रम् (नाटक) – महाकवि कालिदास का मालविकाग्निमित्रम् नाटक राजा अग्रमित्र की प्रेम कहानी पर आधारित नाटक है। और इस कृति को विद्वानों ने इनकी प्रथम कृति का नाम दिया है| अभिज्ञान शाकुन्तलम् (नाटक)- महाकवि कालिदास जी का ये नाटक काफी मशहूर है ये नाटक महाभारत के आदिपर्व के शकुन्तला की व्याख्या पर आधारित है| विक्रमोर्वशीयम् (नाटक) – महाकवि कालिदास का विक्रमोर्वशीयम् नाटक एक रोमांचक और रहस्यों से भरा नाटक है। जिसमें कालिदास जी पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी के प्रेम संबंधों का वर्णन किया है।


कालिदास के जीवन से जुड़ी एक किंवदंती

इन किंवदन्तियाँ में इतिहास का अंश नही अपितु मनोरंजन की छमता है। महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था। अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया। उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास, विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए। गर्मी का मौसम था। धूप काफी तेज और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई। थोड़ी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वह उस ओर बढ़ चले। झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था। कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी।

कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके! बहुत प्यास लगी है, जरा पानी पिला दे।

बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।

कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?

फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके, अभी तुम छोटी हो। इसलिए मुझे नहीं जानती। घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वह मुझे देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं। कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली- आप झूठ कह रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बताएं ?

थोड़ा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो। मेरा गला सूख रहा है। बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है।

कालिदास चकित रह गए। लड़की का तर्क अकाट्य था। बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खड़े थे।

बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी।

कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले- बालिके! मैं बटोही (जो पैदल चलता है) हूं।

मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ?

तेज प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली- आप स्वयं को बड़ा विद्वान बता रहे हैं और यह भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो थक गए हैं। भूख-प्यास से बेदम हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए। इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग चकरा रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ देखा। तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली।

उसके हाथ में खाली मटका था। वह कुएं से पानी भरने लगी। अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा।

स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं। अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूं, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है। दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?

कालिदास लगभग मूर्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं।

स्त्री बोली- फिर असत्य। हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।

नहीं, तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए गलत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे।

वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी। कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए।

माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु (आँख) खोलने के लिए ये स्वांग (नाटक) करना पड़ा। कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

निष्कर्षकालिदास की तुलना पाश्चात्य (पश्चिम के देशों से संबंध रखने वाला) विद्वान शेक्सपियर से की जाती है| शेक्सपियर उपनाम इंग्लैंड में जन्मे इंग्लिश कवि “विलियम शेक्सपियर” से प्रेरित है। यहां पर ध्यान देने योग्य बात है कि विलियम शेक्सपियर का समय काल वर्ष 1564 से 1616 तक रहा है, जबकि महाकवि कालिदास का समय काल चौथी से पांचवी शताब्दी के मध्य रहा है इसलिए कालिदास के इस उपनाम के प्रति विरोधाभास की स्थिति बनी रहती है। कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि थे इसलिए संस्कृत साहित्य पर उनका अतुल्य प्रभाव रहा है। उनकी रचनाएं मुख्य रूप से पुरानी कथाओं तथा दर्शन के आधार पर रची गई हैं। उनके काव्य की क्षमता व प्रभाव को देखते हुए कुछ कवि उन्हें राष्ट्रीय कवि का दर्जा भी देते हैं। कालिदास ने आगे आने वाली पीढ़ियों के कवियों,साहित्यकारों आदि को प्रेरित किया है| इस लिये कवियों की गणना में सबसे पहला नाम कालिदास जी का आता है| (पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः) कवियों की गणना के प्रसंग में कवि कालिदास का नाम कनिष्ठिका अर्थात सबसे छोटी अंगुली पर रखा गया| यह एक उक्ति भले ही हो , किन्तु संस्कृत-कवियों के बारे में यह उक्ति आज भी सार्थक है|

-आकाश झा

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