• Jeevraj Dahiya

दलित चेतना स्रोत: दलित साहित्य

21वीं सदी के प्रारंभ में ही विमर्श के दौर में ‘दलित विमर्श’ अधिकांश साहित्यकारों का प्रिय विषय बन गया। आज के दौर में दलित सबसे अधिक चर्चा में रहे है। किन्तु आज दलित विमर्श को लेकर चर्चा में उतरे रचनाकारों को पता होना चाहिए कि इस चर्चा की नींव वर्षों पहले मुंशी प्रेमचन्द जी ने रख दी थी। प्रेमचन्द जी एक ऐसे प्रगतिशील लेखक थे, जिन्होंने नायक के परंपरागत मानदण्डों को खण्डित कर एक आम आदमी को नायक का दर्जा दिया। उन्होंने प्रसंगानुसार दलितों को अपनी कहानियों में स्थान दिया। उनके अधिकांश पात्र दलित वर्ग से संबंधित हैं। दलित अर्थात ‘मसला’, ‘कुचला’ या रौंदा हुआ होता है।

दलित साहित्य का इतिहास

 दलित हजारों वर्षों तक उच्च जातियों के शोषण का शिकार होते रहे हैं। कभी जमींदार- जागीरदार तो कभी राजा महाराजाओं के द्वारा शोषण और उत्पीड़न ही दलित वर्ग का अंग रहा है। इसके अलावा, दलितों ने जीवन भर संघर्ष, दिन भर काम, समाज से कटकर रहना, गरीबी का जीवन व्यतीत करना और उच्च जातियों के अधी गुलाम के रूप में कार्य करने को मजबूर होना पड़ा जिसका विस्तृत विवरण अनेक दलित साहित्यकारों ने लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया।

दलित साहित्य से तात्‍पर्य दलित जीवन और उसकी समस्‍याओं पर लेखन को केन्‍द्र में रखकर हुए साहित्यिक आंदोलन से है । दलितों को हिंदू समाज व्‍यवस्‍था में सबसे निचले पायदान पर होने के कारण न्याय, शिक्षा, समानता तथा स्वतंत्रता आदि मौलिक अधिकारों से भी वंचित रखा गया। उन्‍हें अपने ही धर्म में अछूत या अस्‍पृश्‍य माना गया। अपने हीं धर्म के लोगों के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा जो उच्च जातियों के द्वारा स्थापित पाखंड और नीची सोच का परिणाम है।

भारतीय समाज में जातिभेद व्यवस्था ने दलितों को उच्च हिंदू समाज से अलग करने में मदद की जिससे दलित हिन्दू होते हुए भी भेदभाव का शिकार होते हैं जो उच्च हिंदू जातियों द्वारा बनाई गई व्यवस्था है। जब दलितों ने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की इन बातों को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया तो इसने दलित साहित्य का रूप धारण कर लिया। दलित साहित्य का लेखन दलित लेखकों और कवियों द्वारा हीं किया गया है इसलिए हमें इसमें वास्तविकता और सत्य की झलक मिलती है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुसार दलितों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। उनकी मान्यतानुसार दलित ही दलित की पीडा़ को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है। इस आशय की पुष्टि के तौर पर रचित अपनी आत्मकथा “जूठन’’ में उन्होंने वंचित वर्ग की समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित शब्द का आशय बताया है– जिसका दलन और दमन हुआ है, दबाया गया है, उत्पीड़ित शोषित, सताया हुआ, गिराया हुआ, उपेक्षित घृणित, रौंदा हुआ, मसला हुआ, कुचला हुआ, विनष्ट, मर्दित, पस्तहिम्मत, हतोत्साहित, वंचित आदि।’

दलित विमर्श जाति आधारित अस्मिता मूलक विमर्श है। इसके केंद्र में दलित जाति के अंतर्गत शामिल मनुष्यों के अनुभवों, कष्टों और संघर्षों को स्वर देने की संगठित कोशिश की गई है। कुछ विद्वान 1914 में ’सरस्वती’ पत्रिका में हीरा डोम द्वारा लिखित ‘अछूत की शिकायत’ को पहली दलित कविता मानते हैं। कुछ अन्य विद्वान स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ को पहला दलित कवि कहते हैं, उनकी कविताएँ 1910 से 1927 तक लिखी गई। दलित साहित्य अस्‍सी और नब्‍बे के दशक में उभरा एक साहित्यिक आंदोलन है जिसमें प्रमुखता से दलित समाज में पैदा हुए रचनाकारों ने हिस्‍सा लिया और इसे अलग धारा मनवाने के लिए संघर्ष किया। दलित साहित्य अनेक भाषाओं में लिखा गया, जैसे-हिन्दी, मराठी, तेलगु, गुजराती, कन्नड़ आदि। दलित साहित्य को लिखने में अनेकों दलित लेखकों और कवियों ने रुचि दिखाई जिससे दलित साहित्य में गुणवत्ता आई। दलित साहित्य मूलतः अम्बेडकर-फुले विचारों को केन्द्र में रखकर ही लिखा गया। उनके और अन्य दलित सुधारकों द्वारा किए गए संघर्ष के फलस्वरूप हीं दलितों के लिए जीवन जीना सुगम हुआ। इसलिए दलित चिंतकों के विचारों को केन्द्र में रखकर दलित साहित्य लिखने का प्रयास किया गया।

सभी दलित रचनाकार इस बिन्दु पर एकमत हैं कि ज्योतिबा फुले ने स्वयं क्रियाशील रहकर सामंती मूल्यों और सामाजिक गुलामी के विरोध का स्वर तेज किया था । ब्राह्मणवादी सोच और वर्चस्व के विरोध में उन्होंने आंदोलन खड़ा किया था । यही कारण है कि जहाँ दलित रचनाकारों ने ज्योतिबा फुले को अपना विशिष्ट विचारक माना वही डॉ. अंबेडकर को अपना शक्तिपुंज स्वीकार किया । दलित यथार्थ की परतें हमें उस संसार की तरफ ले जाती हैं जहाँ श्रम की अमानवीयता है, मरे हुए जानवर का मांस है, गोबर से बीने हुए गेहूं की रोटी है और न जाने कितना कुछ है।

साहित्य में दलित वर्ग की उपस्थिति बौद्ध काल से मुखरित रही है किंतु एक लक्षित मानवाधिकार आंदोलन के रूप में दलित साहित्य मुख्यतः बीसवीं सदी की देन है। दलित पैंथर आंदोलन के दौरान बडी संख्‍या में दलित जातियों से आए रचनाकारों ने आम जनता तक अपनी भावनाओं, पीडाओं, दुखों-दर्दों को लेखों, कविताओं, निबन्धों, जीवनियों, कटाक्षों, व्यंगों, कथाओं आदि के माध्‍यम से पहुंचाया।

सवर्ण और दलित साहित्य

दलित लेखक श्योराज सिंह बेचैन का कहना है कि प्रेमचंद ने दलित समाज के बारे में बहुत लिखा लेकिन क्योंकि वह ख़ुद दलित नहीं थे, इसलिए उन्होंने दलितों को ग़ैर-दलित की ही तरह देखा। वैसे भी हर बाहरी आदमी चीज़ों को दूर से देखकर ही लिख पाता है, जिस पर बीत रही होती है, उसका सबसे प्रभावशाली वर्णन वही कर सकता। प्रेमचंद दलितों के बारे में, बाक़ी लोगों से अच्छा इसलिए लिख पाए कि वह ख़ुद कायस्थ थे और अन्य दलित जातियों की तरह कायस्थ भी ब्राम्हणों के विरुद्ध लड़ रहे थे। यानी दलितों की तरह कायस्थ भी ब्रम्हणों के शोषण का शिकार हो रहे थे। लेकिन प्रेमचंद को दलित लेखकों का विकल्प नहीं माना जा सकता। प्रेमचंद के ज़माने में, लम्ही से ही स्वामी अच्युत्यानंद दलितों का अख़बार “आदि हिंदू” निकाल रहे थे। स्वामीजी डॉ.आम्बेडकर के काफ़ी नज़दीक थे, जब गांधी और आम्बेडकर का मामला आया तो प्रेमचंद गांधी के साथ खड़े थे। इसीलिए प्रेमचंद को सामंतों का मुंशी कहा गया है। उस ज़माने में सामंत दलित महिलाओं का शोषण करते थे और अपनी अवैध संतानों को दलितों की तरह पालते थे। प्रेमचंद भी उसे दलित की तरह नहीं देख पाए। प्रेमचंद एक बड़े लेखक थे, बड़ी बात है कि उन्होंने ग़रीबों और किसानों के बारे में लिखा लेकिन वह दलितों के बारे में ज़्यादा जानते भी नहीं थे। अपनी कहानी “कफ़न” में “घीसू और माधव” के बारे में लिखा है, लेकिन हिन्दी के विख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव ने लिखा कि अगर यह कहानी ” धीसू और माधव” लिखते तो यह कहानी कुछ ओर होती।

प्रेमचंद के साहित्य में जो दलित समाज की तस्वीर है, उसमें और आज के दलित समाज में बहुत बड़ा फ़र्क़ आ चुका है। उस ज़माने में दलितों पर लिखने वाले लेखकों की और ख़ुद दलित लेखकों की बड़ी कमी थी। तब दलितों में केवल स्वामी अच्युत्यानंद थे, आज “घीसू और माधव” ख़ुद लिखने लगे हैं। प्रेमचंद के बाद की पीढ़ी ने, ख़ासकर दलित लेखकों ने दलित साहित्य को न सिर्फ़ खड़ा किया बल्कि उसे विदेशों में फैलाया। दलितों के बारे में आज जो कुछ लिखा जा रहा है, उसे ख़ुद दलित लिख रहे है। इस तरह लेखन की पूरी संस्कृति में बदलाव आया है। एक ज़माना था जब दलितों के हमदर्द के रूप में प्रेमचंद ही दिखाई देते थे। उन्होंने ” कफ़न” जैसी कहानी लिखी और दलितों को हिंदी साहित्य में स्थान दिलवाया। क्योंकि उनसे पहले दलितों के बारे में कहीं कुछ नहीं था। लेकिन प्रेमचंद के पास दलित अनुभव नहीं था, इसलिए वह उनके साथ ज़्यादा न्याय नहीं कर पाए। और यही कारण है दलित समाज प्रेमचंद को नायक के रूप में नहीं देख पाया।

प्रेमचंद को दलितों के साथ न्याय करने की ज़िम्मेदारी किसी ने सौंपी नहीं थी। लेकिन वह ख़ुद जज बन गए थे, लेकिन वह दलितों के साथ न्याय नहीं कर पाए। क्योंकि उन्होंने दलितों को अपने नज़रिए से देखा। वह दलितों के असली दुख-दर्द को ना जान पाए और ना ही समझ पाए क्योंकि उन्हें दलितों की भीतरी स्थितियों का ज्ञान नहीं था।

इनसे स्पष्ट है कि दलित साहित्यकारों और गैर दलित साहित्यकारों के दृष्टिकोण में दलितों को समझने का नज़रिया अलग है।

दलित साहित्य का महत्व

भारत में उच्च जातियों में वे जातियां शामिल हैं जिन्होंने दलितों का शोषण और उत्पीड़न किया, उन्होंने दलितों के लिए विद्यालयों और शिक्षा संस्थानों के दरवाजे बंद रखें जिससे की दलित पढ़-लिखकर आगे नहीं बढ़ पाए। उन्होंने दलित साहित्य लिखने की तों छोड़ो दलितों को पढ़ने तक नहीं दिया। आज अगर वो उच्च जातियां दलित साहित्य लिखने का प्रयास करें तो क्या वो अपने स्वयं के दलितों के उपर हुए अत्याचार को वर्णित कर पाएंगे जो उन्होंने सदियों तक किया, यह सबसे बड़ा सवाल है? दलित साहित्य को लेकर उच्च जातियों का नजरिया यह रहा है कि यह एक बना बनाया साहित्य है परन्तु एक दलित ही समझ सकता है कि दलित साहित्य में कितनी सच्चाई है।

दलित साहित्य की अवधारणा को लेकर लंबी बहसें चलीं, यह सवाल दलित साहित्य में प्रमुखता से छाया रहा कि दलित साहित्य कौन लिख सकता है, यानी स्‍वानुभूति ही प्रामाणिक होगी या सहानुभूति को भी स्‍थान मिलेगा?

दलित साहित्य को लिखने में सबसे जरूरी है कि जिन्होंने दलित जीवन जीया है और वो परेशानियों देखीं हों जो दलित के जीवन का अंग है, इस बात को उच्च वर्ग समझने में नाकाम होगा। उच्च वर्ग ने सदियों तक दलितों का शोषण किया इससे स्पष्ट है कि दलितों के प्रति उनकी राय कैसी होंगी। दलितों की पीड़ा सिर्फ और सिर्फ एक दलित ही समझ सकता है न कि एक उच्च वर्ग का व्यक्ति।

दलित चिंतकों ने इतिहास की पुनर्व्याख्या करने की कोशिश की है। इनके अनुसार गलत इतिहास – बोध के कारण लोगों ने दलितों और स्त्रियों को इतिहास – हीन मान लिया है, जबकि भारत के इतिहास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे इतिहासवान है। सिर्फ जरूरत दलितों और स्त्रियों द्वारा अपने इतिहास को खोजने की है। डॉ . अंबेडकर पहले भारतीय इतिहासकार हैं जिन्होंने इतिहास में दलितों की उपस्थिति को रेखांकित किया है।

कंवल भारती ने दलित साहित्य की व्याख्या करते हुए लिखा है, ‘दलित साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है जिसमें दलितों ने स्वयं अपनी पीड़ा को रूपायित किया है। अपने जीवन संघर्ष में दलितों ने जिस यथार्थ को भोगा है, दलित साहित्य उनकी उसी अभिव्यक्ति का साहित्य है। यह कला के लिए कला नहीं, बल्कि जीवन और जिजीविषा का साहित्य है। इसलिए कहना न होगा कि दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य की कोटि में आता है।’

दलित साहित्य केवल दलित ही लिख सकता है यह बात एक ऐतिहासिक विचारक्रम की उपज है। यह कोई एका-एक प्रकट हुआ नारा नहीं था बल्कि इसके पीछे एक सुचिंतित राजनीति काम कर रही थी और इस राजनीति की यह सफलता ही कही जाएगी उसने आंदोलन की बागडोर अपने हांथों में रखी। तमाम आरोपों–प्रत्यारोपों को झेलते हुए विमर्श और राजनीति के नाजुक संतुलन को साध कर आज वह बेहतर विश्लेषण व आत्मविश्लेषण की ओर बढ़ चुका है।

हिंदी दलित साहित्य ने मोटे तौर पर लगभग छः दशकों की अपनी यात्रा पूरी की है। यह इक्कीसवीं सदी का तृतीय दशक है जब हम अपने देश के बारे में यह कह सकते हैं कि इसने भी सामाजिक लोकतंत्र का एक स्तर पा लिया है। दलित साहित्य के उभार से सामाजिक लोकतंत्र के इस स्तर की भी पुष्टि होती है। लेकिन अभी भी हमारे समाज को मुकम्मल लोकतंत्र हासिल करना बाकी है। सांस्कृतिक और साहित्यिक स्तर पर जो विविधता इस सदी ने देखी है उसमें दलित साहित्य का बहुत योगदान है। इन महत्वपूर्ण बदलावों के बाद भी बहुधा ऐसा लगता है कि सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में अभी भी बदलावों की प्रक्रिया अपना मुकम्मल स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाई है। अभी भी हमारा समाज मध्ययुगीन बर्बरता के दिनों को अपने सीने से चिपकाये हुए है। समाज में दमन की प्रक्रिया अपने विभिन्न रूपों में जारी है। परंपरागत सामंती ब्राह्मणवादी दमन पद्धति ने कई रूप धर लिए हैं। इसके कई रूपों की आवाजाही उत्पीड़ित समाजों में भी हुई है। जिसका जिक्र दलित साहित्य में किया गया है जो दलित लेखकों और कवियों ने लिखा है इसलिए हमें जरूरत है कि उसे पढ़े जिससे कि हम भारत में दलितों को आरक्षण क्यों मिला है, इस बात को समझने में आसानी होगी।

मुक्त चिंतन और अभिव्यक्ति से लेकर खाने की आजादी की हत्या के इस दौर में दलित साहित्य और चिंतन भी एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दरअसल यह नई जिम्मेदरियाँ और नए सोपान तय करने का दौर है। दलित साहित्य के अब तक के विकास क्रम को देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही वह संघर्ष के नए क्षेत्रों में प्रवेश करेगा।

-जीवराज दहिया

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