• Jeevraj Dahiya

दलित शिक्षा: एक समान नियति की तलाश

“शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा।” डॉ आंबेडकर

जब दलितों की शिक्षा के संदर्भ में बात करते हैं तो सबसे बड़ा मुद्दा जो हमारे सामने आता वह है आरक्षण। अब तो आरक्षण व दलित अपने आप में पर्यायवाची बन गए हैं परन्तु जब हम इतिहास में जाएं तो पाते है कि दलित का मतलब अस्पृश्य समुदाय, वंचित वर्ग, पिछड़े, आदिवासी है। संविधान में अनुसूचित जाति-जनजाति शब्द का जिक्र किया गया है। यह वह वर्ग था जो ऐतिहासिक रूप में सदी दर सदी शोषित होता आया है। जब भारत आज़ाद मुल्क बना व संविधान लागू हुआ उस समय एससी-एसटी की साक्षरता दर व नौकरशाही में हिस्सेदारी न के बराबर थी। इन वर्गों को अन्य उच्च वर्ग के बराबर लाने के लिए शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। संविधान में सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित-जनजाति के लिए 15% और 7.5% का आरक्षण था। उससे दलितों के लिए शिक्षा व अन्य दरवाजे खुले जिससे दलित वर्ग की स्थिति में सुधार हुआ। अगर हम सिर्फ दलित शिक्षा का मुद्दा जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचा पाए तो दलित शिक्षा में सुधार होना मुश्किल है। दलितों को सिर्फ आरक्षण के नजरिए से न देखकर उनको मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास करें। पारंपरिक हिंदू सामाजिक संरचना में दलितों को सबसे कम सामाजिक दर्जा मिला है, लेकिन धर्म और एशियाई अध्ययन के एक प्रोफेसर जेम्स लोचेटफेल्ड ने सन् 2002 में कहा था कि “दलित” शब्द को अपनाने और लोकप्रिय बनाने से उनकी स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ती है और इससे अधिक उनके कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की मांग में मुखरता बढ़ती है।

अगर हम दलित शिक्षा सुधारकों की बात करें तो उसमें सबसे पहले नाम आता है डाॅ आम्बेडकर का जिन्होंने खुद स्कूल कक्ष के बाहर बैठ कर शिक्षा प्राप्त की थी उन्होंने अपने पूरे जीवन में दलित शिक्षा के लिए प्रयास किया। उन्होने दलितों के लिए शिक्षा, नौकरी, राजनीति, इत्यादि क्षेत्रों में दरवाजे खोले जिससे दलितों की शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित हो पाईं। भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सबसे सशक्त रूप में डॉ॰ आम्बेडकर ने उठाया। डॉ आम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं। बाबा साहब आम्बेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की थी। उनके अलावा पेरियार रामास्वामी, ज्योतिबा फुले, सावित्री देवी फुले, गाडगे बाबा एवं कांशीराम ने भी अपने जीवन को दलित शिक्षा व दलित सुधार में समर्पित कर दलितों की स्थिति में सुधार का प्रयास किया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपना सम्पूर्ण जीवन दलित उत्थान व महिला शिक्षा को समर्पित किया। एक मान्यता के अनुसार, समाज के ऐसे वर्ग जिन्हें अस्पृश्य (अछूत) की श्रेणी में माना जाता था, उनके लिए ’दलित’ शब्द का प्रयोग भी प्रथम बार महात्मा ज्योतिबा फुले के द्वारा ही किया गया था। सबसे पहले आरक्षण की व्यवस्था करने वाले कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहूजी महाराज थे जिन्होंने अपने राज्य में दलितों व पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। इनके अलावा अन्य महापुरुषों ने भी दलितों की शिक्षा स्थिति में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शिक्षा नीति में आरक्षण की नीति का मुख्य उद्देश्य था कि जो आर्थिक-सामाजिक स्थिति के हिसाब से दलित बहुत निचले स्तर पर थे जिन्हे प्राथमिक शिक्षा तक पहुंच भी मुश्किल थी व माध्यमिक शिक्षा तक आते-आते वो शिक्षा से अलग हो जाते थे, उनके लिए छात्रवृत्ति व छात्रावासों की सुविधा उपलब्ध करवाई गई। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के 44.8 प्रतिशत से अधिक और ग्रामीण भारत में अनुसूचित जाति (एससी) की 33.8 प्रतिशत आबादी 2011-12 में गरीबी रेखा से नीचे रह रही थी। शहरी क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति की 27.3 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की 21.8 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी। ऐसी स्थिति के कारण दलितों की निजी शिक्षा तक पहुंच न के बराबर है। संसदीय पैनल ने चिंता व्यक्त की है कि इन हाशिए के समुदायों के लिए केन्द्र सरकार द्वारा की गई धन की कोई कमी निराशाजनक हो सकती है, विशेष रूप से यह देखते हुए कि पांच में से एक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्र माध्यमिक स्तर पर स्कूल से बाहर हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले दलित समुदाय के बच्चे सबसे अधिक स्कूल छोड़ते हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE) 2017-18 के नवीनतम सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार नामांकन स्तर संतोषजनक है, माध्यमिक स्कूल स्तर पर अनुसूचित जाति के छात्रों की वार्षिक औसत दर 21.8% है। एसटी छात्रों के लिए यह 22.3% था। ऐसी कई व्यवस्था की गई जिससे दलितों को मुख्यधारा में जोड़ने का कार्य हो सकें।

लेकिन चिंता कि बात है कि यह सब होने के बाद भी एक बड़ी समस्या है भेदभाव की को उन्हें विद्यालय व कॉलेज छोड़ने को मजबूर करता है। द इंडिया गवर्नेंस रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक विश्लेषण के अनुसार, 2012-14 के दौरान दलितों ने कर्नाटक में लगभग आधे प्राथमिक विद्यालय छोड़ दिए। हम देखते हैं कि शिक्षा का ग्राफ ऊपर बढ़ रहा है परंतु दलितों की शिक्षा की बात करें तो यह अनुपात जनसंख्या के हिसाब से कम होता जा रहा है। भारत में आजादी के बाद अनेक सरकारों ने अपना काम किया परन्तु दलितों की स्थिति में सुधार कागज़ी कार्य तक ही सीमित रह गया है जमीन स्तर पर पहुंचने में कामयाबी न के बराबर मिली है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में पहली से लेकर 12वीं कक्षा तक में नामांकन में दलितों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से ज्यादा था, हालांकि उच्च शिक्षा में वे राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं, उच्च शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों का राष्ट्रीय औसत 24.3 है जबकि यह दलितों में 19.1% है। राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की ओर से 2014 में प्रकाशित 71वें राउंड के अध्ययन के मुताबिक 7 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों में राष्ट्रीय साक्षरता की दर 75.8 प्रतिशत है जबकि सामान वर्ग में दलित समुदाय के छात्रों की साक्षरता की दर 68.8 प्रतिशत है। हम देखते हैं कि आजादी के बाद आरक्षण की वज़ह से दलितों की उच्च स्तर पर पहुंच सुनिश्चित हुईं है परन्तु भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान व भारतीय प्रबंध संस्थान तक पहुंच काफी कम है और इसकी वज़ह है आर्थिक चुनौती, गरीबी और घर का माहौल, जिसके कारण इन वर्गों से एक छोटा सा हिस्सा ही वहां तक पहुंच पता है। जहां तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बात करें तो पाएंगे कि वहां पर भी एक गरीब परिवार के लिए बड़ा शुल्क वहन करना बहुत मुश्किल होता है। इकोनॉमिक सर्वे ऑफ प्राइवेट एंटरप्राइसेज से पता चलता है कि दलित शिक्षा और नागरिक सुविधाओं में हिस्सेदारी के मामले में पीछे हैं। 2014 में उच्च शिक्षा के लिए नामांकन के मामले में अनुसूचित जाति का हिस्सा 22 फीसदी था, जबकि ऊंची जातियों का हिस्सा 42 फीसदी था, इस प्रकार जाति-आधारित भेदभाव और गरीबी दिखाती है कि कुछ हद तक सुधार के बावजूद दलित आज भी बड़े स्तर पर भेदभाव का सामना कर रहे हैं। इसके कारण दलित बच्चे जो छोटे शहर के होते हुए भी बड़े सपने सजाए है उनके सपने मर जाते हैं। यह सब देखकर हम पाते हैं कि दलित शिक्षा मुश्किल स्थिति में परन्तु वर्तमान में धीरे धीरे प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

अनुसूचित जाति की जनसंख्या 16 करोड़ 66 लाख 35 हजार 700 है, जो कुल आबादी का 16.2 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 8 करोड़ 43 लाख 26 हजार 240 है और यह देश की कुल जनसंख्या का 8.2 फीसदी है। यह जनसंख्या भारत की एक बड़ी आबादी है परन्तु इसकी शिक्षा उस स्तर पर पहुंच नहीं पाई है जितनी आशा संविधान बनाते समय की गई थी। इंडियन एक्सप्रेस ने सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधित्व पर रिपोर्ट प्रकाशित की है। उच्च स्तर पर स्थिति बहुत चिंताजनक है। वास्तव में, स्थिति ऐसी है कि 95.2% प्रोफेसर, 92.9% सहयोगी और 66.27% सहायक प्रोफेसर केंद्र सरकार के विश्वविद्यालयों में सामान्य श्रेणी से हैं। 1125 प्रोफेसरों में से, अनुसूचित जाति से केवल 39 और अनुसूचित जनजाति से 8 यानी क्रमशः 3.47% और 0.7% है, 2620 एसोसिएट प्रोफेसरों में से केवल 130 यानी 4.96% एससी से और एसटी से 34 यानी (1.3%) हैं। 7741 सहायक प्रोफेसरों में से 931 यानी 12% एससी और 423 यानी एसटी से 5.46% हैं। गैर-शिक्षण कर्मचारियों में, केवल 8.96% एससी से, 4.25% एसटी से हैं। इस सेगमेंट में 76% सामान्य श्रेणी के हैं। कैबिनेट सचिवालय में 162 पद हैं और इसमें सिर्फ 15 एससी और 2 एसटी हैं, जबकि 130 अधिकारी अनारक्षित या सामान्य श्रेणी के हैं। यह कैबिनेट सचिवालय में सामान्य श्रेणी के अधिकारियों का आंकड़ा 80% पर है। आरएसटीआई के तहत पेन्सिल और प्रशिक्षण विभाग, यूजीसी और एचआरडी से प्राप्त डेटा के अनुसार, भारत के सबसे बड़े नियोक्ता, रेलवे में एससी-एसटी सबसे खराब स्थिति है। यह दर्शाता है कि वे ग्रुप ए और ग्रुप बी में एससी-एसटी के अधिकारियों के बीच महज 8% हैं। सरकार के उच्च विभाग में इससे भी कम प्रतिनिधित्व हैं। सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल के लिए गठित कुंडु समिति ने अपने अध्ययन में पाया कि ग्रामीण इलाकों में सबसे बदहाल दलित हिंदू हैं, शहरों में भी उनकी स्थिति पिछड़े मुसलमानों जैसी है। दलितों की साक्षरता दर सुधरी है, लेकिन सामान्य वर्ग की 74 फीसदी साक्षरता के मुकाबले उनकी दर 66 फीसदी ही है एवं उन्हें लाभ भी पूरा नहीं मिल पा रहा है। सरकार द्वारा वित्त पोषित उच्च शिक्षा के अकादमिक संस्थानों में एससी के लिए 15 फीसदी और एसटी के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण है। इससे दलित छात्रों के नामांकन की दर में पहले के मुकाबले कुछ सुधार तो आया है लेकिन एक तो ये अपेक्षित दर नहीं है और दूसरा उच्च शिक्षा में दलित छात्रों पर उम्मीदों का दबाव बनने लगता है और वे जो दबाछिपा या खुलेआम भेदभाव झेलते हैं, वो व्यथा ज्यादा तोड़ती है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट-2011 के मुताबिक शिक्षा के निजीकरण का सबसे ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ है क्योंकि उनके बच्चे महंगी शिक्षा से वंचित हुए हैं। सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस नाम की एक संस्था ने अपने एक सर्वे में पाया कि अनुसूचित जाति के परिवारों में सिर्फ 0.73 फीसदी घरों में कोई सदस्य सरकारी नौकरी पर है।

बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री डा. अशोक कुमार चौधरी के मुताबिक सरकारी नौकरियों में दलितों का आलम यह है कि 82.54% सफाई कर्मचारी सिर्फ डोम, मेहतर, बांसफोड़ भंगी जातियों से हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कुल छात्रों की संख्या का करीब एक-तिहाई है और यहां भी कोई आरक्षण नहीं है इसलिए 80 फीसदी निजी नौकरियों और 30 फीसदी शिक्षा क्षेत्र में दलितों की हिस्सेदारी बहुत ही कम है। इस प्रकार निजी क्षेत्र में उनके लिए चुनौतियां बनी हुई हैं।

आप देखें कि जो केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केंद्रीय विद्यालय हैं, जो सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल हैं, गांव में जो मेरिट वाले बच्चे हैं उनके लिए नवोदय स्कूल हैं, और सामान्य बच्चों के लिए नगर निगम के स्कूल हैं, प्राइवेट की तो बात ही नहीं कर सकते क्योंकि उनमें अंतरराष्ट्रीय मानकों तक के आधार पर पढ़ाई हो रही हैं। इससे एक तरह की असमानता हम लोगों ने ही पैदा कर दी है, समाज का एक विशेष आर्थिक पहुँच वाला व्यक्ति ही अपने बच्चों को यह शिक्षा दे पा रहा है और बाकी के लिए सरकारी पाठशालाएं हैं। हम अच्छे स्कूलों को ख़त्म न करें पर आम लोगों के लिए उपलब्ध शिक्षा व्यवस्था में अध्यापक से लेकर सामग्री तक सुधार तो लाएं ताकि ग़रीब तबका और दलित समाज के बच्चे औरों के सामने खड़े तो हो सकें। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता सुधारने की ज़रूरत भी है और सरकार को इसका अहसास भी है। ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े वर्ग जैसे आदिवासी, दलित, महिलाएं, अल्पसंख्यक और फिर ग़रीब व्यक्ति इन सभी को शिक्षा में समान अधिकार दिए जाने की ज़रूरत है। जिन दलितों की स्थिति सुधरी है उन्हें भी शिक्षा में समान अधिकार तो मिलने चाहिए पर आर्थिक सहूलियतें उन्हें ही देनी चाहिए जो कि ग़रीब हैं। दलित शिक्षा के सन्दर्भ में सुधार की गुंजाइश की बात करें तो पाएंगे कि जमीन स्तर दलित शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि भेदभाव जमीनी स्तर पर क़ायम है जब तक दलित समाज भेदभाव का दंश झेलता रहा तब तक उसको आगे बढ़ने में दिक्कत होगी। ग्रामीण स्तर पर शिक्षा में दलितों के प्रति लोगों को जागरूक किया जाएं जिससे लोगों के में से भेदभाव जैसी मानसिकता निकल सकें। दलित शिक्षा को अभियान के तहत बढ़ाने की कोशिश की जाएं तो जरूर सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे।

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हम कह सकते है दलित शिक्षा अभी भी भारत आज़ाद मुल्क बनने के बाद जितनी आशा थी उस स्तर तक पहुंच नहीं पाई है। क्योंकि सरकारों ने सिर्फ आरक्षण हर बार बढ़ाया न कि स्थिति का विश्लेषण किया। आज भी हमें उच्च स्तर पर जाने पर कम हीं दलित नज़र आते हैं। दलित मुद्दों की बात सिर्फ राजनीति तक पहुंचकर रुक जाती है उससे आगे पहुंच भी नहीं पातीं है। अगर केन्द्र सरकार इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाकर दलितों की शिक्षा स्थिति का जायजा ले तो जरूर उसके बाद दलित शिक्षा का ग्राफ ऊपर बढ़ सकने में सक्षम हो।

-जीवराज jeev1074@gmail.com

चित्रित छवि पहली बार वर्ल्ड एजुकेशन ब्लॉग पे दिखाई दी | 

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